Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 854
Reading 352 of 452 · Source nos. 9951–9962 · Source PDF 357
1कृष्ण बोले वर माँगो गोविंद राधे।
2गोपियों ने कहा कृष्ण ते मिला दे॥ 9951॥
3हार मानी कृष्ण ने गोविंद राधे।
4बनि गये नटखट द्विभुज बता दे॥ 9952॥
5गोपी प्रेम सन्मुख गोविंद राधे।
6कृष्ण ऐश्वर्य शक्ति टिके ना बता दे॥ 9953॥
7गोपियों ने वेदों को गोविंद राधे।
8पढ़ा ना सुना भाव लक्ष्य दिला दे॥ 9954॥
9गोपी प्रेम हरि को भी गोविंद राधे।
10गोलोक ते भी माया लोक बुला दे॥ 9955॥
11हरि हरें योगी मन गोविंद राधे।
12गोपी हरें हरि मन हरिता भुला दे॥ 9956॥
13गोपी प्रेम विधि हरि गोविंद राधे।
14हर जित ब्रह्म को ब्रज में हरा दे॥ 9957॥
15हरि अति चंचल गोविंद राधे।
16गोपी प्रेम हरि चंचलता भुला दे॥ 9958॥
17गोपी प्रेम आधीन गोविंद राधे।
18श्रुति जेहि नेति नेति करके बता दे॥ 9959॥
19अर्जुन ने पूछा कृष्ण गोविंद राधे।
20आप के मन की बात जाने को बता दे॥ 9960॥
21कृष्ण ने कहा पार्थ गोविंद राधे।
22मेरे मन की जानें गोपियाँ बता दे॥ 9961॥
23अर्जुन ने पूछा कृष्ण गोविंद राधे।
24नित गोपीप्रेम महिमा क्यों सुना दे॥ 9962॥