Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 724
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1सखी उत्कण्ठा के गोविंद राधे।
2वर्धन हित गये आगे बता दे॥ 8391॥
3कछु दिन पाछे पुनि गोविंद राधे।
4आये रँगीली घर लाल बता दे॥ 8392॥
5लखि के अनूप रूप गोविंद राधे।
6ह्वै गई रँगीली बेसुध बता दे॥ 8393॥
7सखि मूर्छित लखि गोविंद राधे।
8लाल ने ढूँढ़ लिया मटुकी बता दे॥ 8394॥
9छकि के खाया अरु गोविंद राधे।
10फोरि दइ माखन मटुकी बता दे॥ 8395॥
11गई जब मूर्च्छा तो गोविंद राधे।
12देखा सखी ने कुचाल बता दे॥ 8396॥
13सखी ने सोचा मैं तो गोविंद राधे।
14जानती थी वाय भोरो बता दे॥ 8397॥
15वह तो महाधूर्त गोविंद राधे।
16निकला निपट नटखट ही बता दे॥ 8398॥
17सखी ने सोचा मन गोविंद राधे।
18दारी केअब कभू अइयो बता दे॥ 8399॥
19दूसरे दिन लाल गोविंद राधे।
20संग सखन लै के आये बता दे॥ 8400॥
21सखी ने दूर ही ते गोविंद राधे।
22देखा भूली सुधि तनु की बता दे॥ 8401॥
23फिर क्या था लाला ने गोविंद राधे।
24मटुकी उतारी लगे खाने बता दे॥ 8402॥