Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 712
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1छेड़ाछेड़ी छोड़ न तु गोविंद राधे।
2सब गोपी मिलि उल्टो टँगवा दे॥ 8247॥
3छोटा सा नन्दढोटा गोविंद राधे।
4आँखि मारे जो भी देखे पागल बना दे॥ 8248॥
5चंचल तजु अंचल गोविंद राधे।
6लोग लखि एक की सात लगा दें॥ 8249॥
7ब्रह्म निरंजन जनि गोविंद राधे।
8मानो, गोपीदृगअंजन है दिखा दे॥ 8250॥
9श्याम को चिढ़ावें गोपी गोविंद राधे।
10कोउ मुरली कोउ अम्बर छुपा दे॥ 8251॥
11गोपी प्रेम वश हरि गोविंद राधे।
12जाय यमुनतट घट उठवा दे॥ 8252॥
13हरि को है प्यार प्यारा गोविंद राधे।
14गोपी जब चाहे जैसा नाच नचा दे॥ 8253॥
15जासों सारा जग नाचे गोविंद राधे।
16वाको गँवार गोपी तारी पै नचा दें॥ 8254॥
17गोपीजन प्रेम ऐसा गोविंद राधे।
18सब को नचाने वाले को भी नचा दे॥ 8255॥
19एक दिन चन्द्रकला गोविंद राधे।
20यमुना जल गयी भरन बता दे॥ 8256॥
21डगर में नन्दलाल गोविंद राधे।
22आके मारग रोक्यो बता दे॥ 8257॥
23नैनन बानन गोविंद राधे।
24किया घायल चन्द्रकला को बता दे॥ 8258॥