Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 709
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1अतएव कृष्ण भिन्न गोविंद राधे।
2कोइ तत्व कहीं भी नहीं है बता दे॥ 8211॥
3जिस जल में नहाईं गोविंद राधे।
4गोपी नग्न उसमें भी कृष्ण थे बता दे॥ 8212॥
5गोपी तनु रोम रोम गोविंद राधे।
6व्याप्त कृष्ण ते कौन पर्दा बता दे॥ 8213॥
7ब्रज गोपी भीतर गोविंद राधे।
8बाहर एक मात्र कृष्ण हैं बता दे॥ 8214॥
9जीव के जीव हैं गोविंद राधे।
10परमात्मा श्रीकृष्ण बता दे॥ 8215॥
11आत्माओं का क्या गोविंद राधे।
12पर्दा परमात्मा ते बता दे॥ 8216॥
13याते कृष्ण लीला में गोविंद राधे।
14दोष देखना महामूर्खता बता दे॥ 8217॥
15योग ते अलभ्य पद गोविंद राधे।
16ब्रज गोपियों ने पाया भोग ते बता दे॥ 8218॥
17मुमुक्षु विषयों में गोविंद राधे।
18दोष देखे ऐसे गोपी कृष्ण में बता दे॥ 8219॥
19गोपी कह पिय में क्यों गोविंद राधे।
20दोषदर्शन प्रेम और बढ़ा दे॥ 8220॥
21श्याम को न देखो कोऊ गोविंद राधे।
22दिन नहिं चैन रैन नींद भी भगा दे॥ 8221॥
23श्याम को न देखो कोऊ गोविंद राधे।
24श्याम मन को भी श्यामरंग में डुबा दे॥ 8222॥