Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 693
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1कान्ह तो न तम युक्त गोविंद राधे।
2ब्रह्म की समाधि भी न नींद क्यों बता दे॥ 8024॥
3कान्ह को तो योगमाया गोविंद राधे।
4प्राकृत नर सम आ के सुला दे॥ 8025॥
5कान्ह सोये तो भी जागे गोविंद राधे।
6कान्ह जागे तो भी सोये प्रेम में बता दे॥ 8026॥
7सब को जगावे कान्ह गोविंद राधे।
8कान्ह को जगावे भला कौन बता दे॥ 8027॥
9सोये को जगायें सब गोविंद राधे।
10जागे को जगाये भला कौन बता दे॥ 8028॥
11भैया कह सुनु मैया गोविंद राधे।
12प्रलय में सोये यह वेद बता दे॥ 8029॥
13सोेते हुए कान्ह लखि गोविंद राधे।
14भोर महँ मैया विभोर बता दे॥ 8030॥
15प्रत्यूष बेला आई गोविंद राधे।
16चलु री यशोदा माई कान्ह को जगा दे॥ 8031॥
17चन्द्रकिरन गई गोविंद राधे।
18भानु किरन आई कान्ह को जगा दे॥ 8032॥
19चार पहर रात गई गोविंद राधे।
20बेला प्रभात आई कान्ह को जगा दे॥ 8033॥
21बेला प्रभात आई गोविंद राधे।
22सब को जगाने वाले लाल को जगा दे॥ 8034॥
23भोर भई चहुँ ओर गोविंद राधे।
24शोर दधि मन्थन कान्ह को जगा दे॥ 8035॥