Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
लीला माधुरी · पृष्ठ 661
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1अजगर रूपधारी गोविंद राधे।
2अघासुर मुख कृष्ण गये थे बता दे॥ 7640॥
3अघासुर मर कर गोविंद राधे।
4श्रीकृष्ण में ही मिल गया था बता दे॥ 7641॥
5प्रश्न है अघासुर गोविंद राधे।
6भगवत्सायुज्य पाया क्यों बता दे॥ 7642॥
7शुक कह कृष्ण की गोविंद राधे।
8मानसी प्रतिमा ही मुक्त करा दे॥ 7643॥
9अघासुर के तो मुख गोविंद राधे।
10ब्रह्म कृष्ण हुये थे प्रविष्ट बता दे॥ 7644॥
11मणिमय प्रांगण गोविंद राधे।
12घुटुवन बल हरि चलें थे बता दे॥ 7645॥
13चलते हुये देखा गोविंद राधे।
14हरि ने निज प्रतिबिम्ब बता दे॥ 7646॥
15लखतहिं मोहन गोविंद राधे।
16मन मोहित हो गया था बता दे॥ 7647॥
17पकरन चह तेहि गोविंद राधे।
18पकरि न पाये खिसियाये बता दे॥ 7648॥
19हारि लखि मैया मुख गोविंद राधे।
20हरि लगे रोने खीझि, मैया मुसका दे॥ 7649॥
21हरि तुतरा के कह गोविंद राधे।
22मैया निज कर मोहिं पकरा दे॥ 7650॥
23मैया कह वेगि चलु गोविंद राधे।
24भैया को बाबा बहु लाड़ लड़ा दे॥ 7651॥