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Radha Govind Geet Part 2

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

लीला माधुरी · पृष्ठ 643

Reading 141 of 452 · Source nos. 7424–7435 · Source PDF 146

1मायावृत माने गोविंद राधे।

2सृष्टि आदि के नाना देव बता दे॥ 7424॥

3तत्व का ज्ञानी तो गोविंद राधे।

4सर्व रूप में देखे आप को बता दे॥ 7425॥

5विश्व कल्याण हित गोविंद राधे।

6आप धरेँ रूप अनन्त बता दे॥ 7426॥

7आपके सब रूप गोविंद राधे।

8दिव्य सत्वमय होते हैं बता दे॥ 7427॥

9आपके वे ही रूप गोविंद राधे।

10खलों के हित कालरूप बता दे॥ 7428॥

11आपको बिरले ही गोविंद राधे।

12आत्मसमर्पण करते बता दे॥ 7429॥

13वे ही भवसागर को गोविंद राधे।

14गोखुर सम लाँघ जाते बता दे॥ 7430॥

15आपके भक्त जन गोविंद राधे।

16जग के सच्चे हितैषी बता दे॥ 7431॥

17भक्त जनों के हित गोविंद राधे।

18आप अनुग्रहरूप बता दे॥ 7432॥

19ज्ञानाभिमानी जो गोविंद राधे।

20आपकी शरण गहें ना बता दे॥ 7433॥

21वे ज्ञानी झूठमूठ गोविंद राधे।

22अपने को मुक्त ही मानें बता दे॥ 7434॥

23आपकी भक्ति बिनु गोविंद राधे।

24बुद्धि भी शुद्ध नाहिं होगी बता दे॥ 7435॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 2 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers continue at 5902 and end at 11111. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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