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Radha Govind Geet Part 2

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

अवतार · पृष्ठ 613

Reading 111 of 452 · Source nos. 7078–7089 · Source PDF 116

1हरि अश्रुत किन्तु गोविंद राधे।

2चिन्मय कर्ण ते हैं श्रुत भी बता दे॥ 7078॥

3हरि अस्पृश्य किन्तु गोविंद राधे।

4चिन्मय त्वक् ते स्पृश्य भी बता दे॥ 7079॥

5हरि अग्राह्य किन्तु गोविंद राधे।

6दिव्य शुद्ध प्रेम ते हैं ग्राह्य भी बता दे॥ 7080॥

7श्रीकृष्ण धाम भी है गोविंद राधे।

8चिदानन्दमय गोलोक बता दे॥ 7081॥

9वेद में ब्रह्मलोक गोविंद राधे।

10गोलोक पर्यायवाची बता दे॥ 7082॥

11परव्योम ऊपर गोविंद राधे।

12गोलोक है कृष्ण लोक बता दे॥ 7083॥

13ऊपर है गोलोक गोविंद राधे।

14नीचे है हरि हर धाम बता दे॥ 7084॥

15गोलोक ते वैकुण्ठ गोविंद राधे।

16दूर पचास कोटि योजन बता दे॥ 7085॥

17गोलोक लम्बा चौड़ा गोविंद राधे।

18तीन करोड़ योजन वाला बता दे॥ 7086॥

19प्रकृति परव्योम मधि गोविंद राधे।

20विरजा नदी है पावनी ही बता दे॥ 7087॥

21विरजा के एक ओर गोविंद राधे।

22परव्योम लोक है दिव्य बता दे॥ 7088॥

23विरजा के दूजी ओर गोविंद राधे।

24मायिक लोक अनंत बता दे॥ 7089॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 2 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers continue at 5902 and end at 11111. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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