Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
श्री राधा · पृष्ठ 543
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1किलकिंचित् महाभाव गोविंद राधे।
2आँखों ते ही हो व्यक्त बता दे॥ 6302॥
3पूर्व कृष्ण रूप लखि गोविंद राधे।
4राधा को हुआ अति हर्ष बता दे॥ 6303॥
5हर्ष ते आई पुनि गोविंद राधे।
6मन्द मुसकान उज्वलता बता दे॥ 6304॥
7पलकों में आनँद जल गोविंद राधे।
8यही है रुदन का ज्ञापक बता दे॥ 6305॥
9नेत्रों के प्रान्त भाग गोविंद राधे।
10लालिमा युक्त यही क्रोध बता दे॥ 6306॥
11राधा के नेत्रों में गोविंद राधे।
12रसप्राप्तिइच्छा अभिलाषा बता दे॥ 6307॥
13कृष्ण आगे दृष्टि का गोविंद राधे।
14संकुचित होना यह भय है बता दे॥ 6308॥
15नेत्र पुतलियों की गोविंद राधे।
16वक्रता है गर्व असूया बता दे॥ 6309॥
17इमि दृष्टि राधा की गोविंद राधे।
18अष्ट पुष्प गुच्छ ज्यों कृष्ण को लुभा दे॥ 6310॥
19राधा कृष्ण संग सुख गोविंद राधे।
20यद्यपि सबते बड़ा सुख है बता दे॥ 6311॥
21उसका भी कोटि गुना गोविंद राधे।
22किलकिंचित् भाव सुख है बता दे॥ 6312॥
23एक बार राधा गईं गोविंद राधे।
24सखियों के संग सिद्धाश्रम बता दे॥ 6313॥