Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ब्रजधाम · पृष्ठ 513
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1ब्रजरस रस अस गोविंद राधे।
2द्वारिका की पटरानियों को भी ना दे॥ 5968॥
3दिव्य ब्रजरस ऐसा गोविंद राधे।
4लक्ष्मी ते चिर काल तप करवा दे॥ 5969॥
5ब्रजरस रस अस गोविंद राधे।
6रसरूप ब्रह्म को भी रोना सिखा दे॥ 5970॥
7ब्रजरस रस अस गोविंद राधे।
8आत्मतृप्त ब्रह्म को भी प्यासा बना दे॥ 5971॥
9ब्रजरस रस अस गोविंद राधे।
10भगवान की भगवत्ता भुला दे॥ 5972॥
11अधिकारी भेद ते ही गोविंद राधे।
12रस की अनेक कोटि रसिक बता दे॥ 5973॥
13सब रस कोटियों में गोविंद राधे।
14ब्रजरस सबते है सरस बता दे॥ 5974॥
15ब्रजरस सुख ऐसा गोविंद राधे।
16रमा भी वैकुण्ठ सुख को भुला दे॥ 5975॥
17ब्रजरस ऐसा है गोविंद राधे।
18जितना पियो रस प्यास बढ़ा दे॥ 5976॥
19ब्रज दास्य रस उच्च गोविंद राधे।
20अन्य धाम दास्य रस निम्न बता दे॥ 5977॥
21ब्रज सख्य रस उच्च गोविंद राधे।
22अन्य धाम सख्य रस निम्न बता दे॥ 5978॥
23ब्रज वात्सल्य उच्च गोविंद राधे।
24अन्य धाम वात्सल्य निम्न बता दे॥ 5979॥