Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ब्रजधाम · पृष्ठ 512
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1ब्रजरस रस ऐसा गोविंद राधे।
2जो रस रस को भी बस में करा दे॥ 5956॥
3ब्रजरस रस अस गोविंद राधे।
4रस को भी बरबस रस में डुबा दे॥ 5957॥
5ब्रजरस रस ऐसा गोविंद राधे।
6रस को भी बरबस धरा पै गिरा दे॥ 5958॥
7ब्रजरस बस रस गोविंद राधे।
8ब्रजरस रस सम रस ना बता दे॥ 5959॥
9ब्रजरस पीके पी के गोविंद राधे।
10सुख में सुखी हो वाय गोपी बता दे॥ 5960॥
11ब्रजरसरसिक तो गोविंद राधे।
12श्यामा श्याम मय जग सारा बता दे॥ 5961॥
13ब्रजरसरसिक तो गोविंद राधे।
14चारों मोक्ष सुख लखि मुँह बिचका दे॥ 5962॥
15ब्रजरसरसिक ते गोविंद राधे।
16दासी पद माँगे मुक्ति रसिक भगा दे॥ 5963॥
17ब्रजरसरसिक तो गोविंद राधे।
18बैकुण्ठ सुख को भी खारा बता दे॥ 5964॥
19ब्रजरसरसिक तो गोविंद राधे।
20द्वारिका के रस को भी फीका बता दे॥ 5965॥
21ब्रज का है ब्रजरस गोविंद राधे।
22बैकुण्ठ द्वारिका ते मधुर बता दे॥ 5966॥
23ब्रजरस रस अस गोविंद राधे।
24निज सुत चतुरानन को भी ना दे॥ 5967॥