Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 500
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1हरि में तो जार भाव गोविंद राधे।
2तीनों ताप अरु पुण्य पाप जला दे॥ 5840॥
3हरि में तो जार भाव गोविंद राधे।
4हरि ते मिला दे अरु माया को भगा दे॥ 5841॥
5हरि में तो जार भाव गोविंद राधे।
6दिव्य चिन्मय हरि धाम दिला दे॥ 5842॥
7जग जार प्रेम तो हो गोविंद राधे।
8चोरी चोरी कोई नहिं जाने बता दे॥ 5843॥
9कृष्ण जार प्रेम तो हो गोविंद राधे।
10बीच बजार खुल्लम खुल्ला बता दे॥ 5844॥
11श्रीकृष्ण उपपति गोविंद राधे।
12होकर भी परम पति हैं बता दे॥ 5845॥
13जग काम निन्दनीय गोविंद राधे।
14कृष्ण काम तो वन्दनीय है बता दे॥ 5846॥
15कृष्ण भक्त यदि चह गोविंद राधे।
16जग का विषय वह निंद्य है बता दे॥ 5847॥
17कृष्ण प्रेमिका कु ब्जा गोविंद राधे।
18कृष्ण का विषय चाहा वंद्य है बता दे॥ 5848॥
19कृष्ण काम काम नहिं गोविंद राधे।
20भर्जित बीज ना हो अंकुरित बता दे॥ 5849॥
21भुने या उबले गोविंद राधे।
22बीज कभू ना दें अंकुर बता दे॥ 5850॥
23हरि सम्बन्धी काम गोविंद राधे।
24प्रेम ही है माया का बंध छुड़ा दे॥ 5851॥