Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 499
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1आँखों के भाग्य में गोविंद राधे।
2हरि दर्शन सुख लिखा ना बता दे॥ 5828॥
3हरि के वियोग योग गोविंद राधे।
4दोनों में, आँखों में जल हो बता दे॥ 5829॥
5श्याम प्रेम रोगी कह गोविंद राधे।
6मेरे रोग का वैद्य श्याम है बुला दे॥ 5830॥
7श्याम वैद्य आवे तो गोविंद राधे।
8प्रेम रोग और बढ़ि जाये बता दे॥ 5831॥
9इसी लुका छिपी में ही गोविंद राधे।
10प्रेमी को मिले रस अमित बता दे॥ 5832॥
11प्रेम है अमूल्य वस्तु गोविंद राधे।
12याते छिपाओ यथा शक्ति बता दे॥ 5833॥
13कुलटा का प्यार जैसा गोविंद राधे।
14जग को जना ना मन हरि में लगा दे॥ 5834॥
15“जरयति गुणान्” अर्थ गोविंद राधे।
16जग जार परलोक लाभ जला दे॥ 5835॥
17“जरयत्यविद्यां” अर्थ गोविंद राधे।
18कृष्ण जार ग्रन्थि अविद्या जला दे॥ 5836॥
19दिव्य जार श्रीकृष्ण गोविंद राधे।
20जगत के पंच प्रपंच जला दे॥ 5837॥
21हरि में तो जार भाव गोविंद राधे।
22त्रिगुण, त्रिकर्म, त्रिदेह जला दे॥ 5838॥
23हरि में तो जार भाव गोविंद राधे।
24पंचक्लेश अरु पंचकोश जला दे॥ 5839॥