Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 497
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1नारद गये ब्रज गोविंद राधे।
2कष्ट भी बताया गोपियों को बता दे॥ 5804॥
3सब ब्रज गोपियों ने गोविंद राधे।
4नारद आगे निज पग फैला दे॥ 5805॥
5लखि प्रेम गोपीजन गोविंद राधे।
6नारद नैनों ते नीर बहा दे॥ 5806॥
7गोपी पदरज लैके गोविंद राधे।
8नारद पूर्व निज सिर में लगा दे॥ 5807॥
9पद रज लैके पुनि गोविंद राधे।
10गये द्वारिका कृष्ण सिर में लगा दे॥ 5808॥
11नारद ने पूरी कथा गोविंद राधे।
12रुक्मिणी आदि को सुनाई बता दे॥ 5809॥
13सब ने कहा धन्य गोविंद राधे।
14गोपी, धन्य धन्य गोपीप्रेम बता दे॥ 5810॥
15भाव तो प्रमुख दो गोविंद राधे।
16एक स्वकीया भाव बता दे॥ 5811॥
17दूजा भाव है गोविंद राधे।
18परकीया सर्वोच्च बता दे॥ 5812॥
19रुक्मिणी आदि का गोविंद राधे।
20भाव तो एक स्वकीया बता दे॥ 5813॥
21ब्रज गोपियों का गोविंद राधे।
22भाव तो था परकीया बता दे॥ 5814॥
23परकीया भाव में तो गोविंद राधे।
24गुरूक्ति विषवर्षण हो बता दे॥ 5815॥