Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 496
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1एक बार नारद गोविंद राधे।
2गये द्वारिका कृष्ण पास बता दे॥ 5792॥
3नारद बोले कृष्ण गोविंद राधे।
4बार बार गोपीप्रेम श्रेष्ठ क्यों बता दे॥ 5793॥
5याते रुक्मिणी आदि गोविंद राधे।
6बार बार दुखी होती हैं बता दे॥ 5794॥
7कृष्ण ने कहा फिर गोविंद राधे।
8बता दूँगा अभी मेरी सुनो तुम बता दे॥ 5795॥
9सिर में भयंकर गोविंद राधे।
10पीड़ा है कहीं जाके औषधि ला दे॥ 5796॥
11नारद सोचे यह गोविंद राधे।
12नटखट की कोइ लीला है बता दे॥ 5797॥
13नारद बोले प्रभु गोविंद राधे।
14इस रोग की औषधि भी बता दे॥ 5798॥
15हरि बोले कोई भक्त गोविंद राधे।
16निज पदरज मम सिर में लगा दे॥ 5799॥
17नारद जहाँ भी माँगें गोविंद राधे।
18भक्त पदरज भक्त खिल्ली उड़ा दे॥ 5800॥
19कृष्ण पत्नियों ते भी गोविंद राधे।
20पूछा किन्तु पत्नियों ने डाटा बता दे॥ 5801॥
21पुनि हरि ढिग जाके गोविंद राधे।
22कहा जग कोई भक्त पदरज ना दे॥ 5802॥
23कृष्ण ने कहा ब्रज गोविंद राधे।
24जाके गोपियों को मेरा कष्ट बता दे॥ 5803॥