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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 493

Reading 504 of 516 · Source nos. 5756–5767 · Source PDF 510

1जिन लक्ष्य कृष्णसुख गोविंद राधे।

2उन रति समर्था प्रेम मधुवत् बता दे॥ 5756॥

3जिन लक्ष्य कृष्ण सुख गोविंद राधे।

4उनका है राग मंजिष्ठा बता दे॥ 5757॥

5उभय सुखकामी की गोविंद राधे।

6रति समंजसा प्रेम घृतवत् बता दे॥ 5758॥

7उभय सुखकामी का गोविंद राधे।

8राग कुसुमिका रसिक बता दे॥ 5759॥

9निज सुखकामी की गोविंद राधे।

10रति एकमात्र साधारणी बता दे॥ 5760॥

11निज सुखकामी प्रेम गोविंद राधे।

12लाक्षावत राग शिरीषा बता दे॥ 5761॥

13प्रथम उत्तम दूजा गोविंद राधे।

14मध्यम अधम है तीसरा बता दे॥ 5762॥

15सर्वश्रेष्ठ भक्ति तो है गोविंद राधे।

16महाभाव गोपीजन भक्ति बता दे॥ 5763॥

17युगल मिलन में भी गोविंद राधे।

18अनुभव हो विप्रयोग का बता दे॥ 5764॥

19युगल वियोग में भी गोविंद राधे।

20अनुभव हो संयोग का बता दे॥ 5765॥

21प्रेम उत्कृष्टता ते गोविंद राधे।

22योग में वियोग अनुभव हो बता दे॥ 5766॥

23वह विरह अनुभव गोविंद राधे।

24गोपीजन प्रेम वैचित्र्य बता दे॥ 5767॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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