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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 491

Reading 502 of 516 · Source nos. 5732–5743 · Source PDF 508

1प्रेम के हेतु ही हो गोविंद राधे।

2मधु प्रेम ना हो अन्य हेतु बता दे॥ 5732॥

3प्रेमास्पद सुख गोविंद राधे।

4मधु प्रेम का एक लक्ष्य बता दे॥ 5733॥

5प्रियतम स्वार्थ ही गोविंद राधे।

6मधु प्रेम में निज स्वार्थ बता दे॥ 5734॥

7मधु प्रेम में ही हो गोविंद राधे।

8आत्मसमर्पण पूर्ण बता दे॥ 5735॥

9मधु प्रेम का स्वभाव गोविंद राधे।

10नित्य नित्य वर्धनशीलता बता दे॥ 5736॥

11मधु प्रेम दुर्लभ गोविंद राधे।

12ललिता विशाखा आदि में बता दे॥ 5737॥

13अति आदरमय गोविंद राधे।

14स्नेह नाम है घृत स्नेह बता दे॥ 5738॥

15अति ममतामय गोविंद राधे।

16स्नेह नाम है मधु स्नेह बता दे॥ 5739॥

17“मैं उनका हूँ” यह गोविंद राधे।

18स्नेह नाम है घृत स्नेह बता दे॥ 5740॥

19“वे मेरे हैं” यह गोविंद राधे।

20स्नेह नाम है मधु स्नेह बता दे॥ 5741॥

21राग तीन मंजिष्ठा गोविंद राधे।

22कुसुमिका और शिरीषा बता दे॥ 5742॥

23मंजिष्ठा बेल नाम गोविंद राधे।

24लाल लाल स्थिर चमक वाली बता दे॥ 5743॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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