Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 490
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1स्नेह मान प्रणय राग गोविंद राधे।
2अनुराग भाव महाभाव बता दे॥ 5720॥
3अधिकारी भेद ते ही गोविंद राधे।
4उपर्युक्त प्रेमकोटि प्राप्त हों बता दे॥ 5721॥
5महाभाव प्रेम तो गोविंद राधे।
6ब्रजगोपीप्रेम की है सीमा बता दे॥ 5722॥
7प्रेम के तीन भाव गोविंद राधे।
8लाक्षावत् घृतवत् मधुवत् बता दे॥ 5723॥
9निम्न भाव लाक्षा है गोविंद राधे।
10एकमात्र निज सुख हित हो बता दे॥ 5724॥
11आग ते पिघले ज्योँ गोविंद राधे।
12लाख, हरि देखि त्यौं प्रकटे बता दे॥ 5725॥
13लाक्षा सकाम प्रेम गोविंद राधे।
14उदाहरण कुब्जा आदि बता दे॥ 5726॥
15लाक्षा ते श्रेष्ठ घृत गोविंद राधे।
16निजसुख पियसुख युक्त बता दे॥ 5727॥
17पिय ते जो मान पाके गोविंद राधे।
18बढ़े उपेक्षा ते घटे भी बता दे॥ 5728॥
19जैसे घृत शैत्य ते गोविंद राधे।
20कड़ा उष्णता ते पिघले बता दे॥ 5729॥
21चन्द्रावली आदि गोविंद राधे।
22घृत प्रेम की उदाहरण बता दे॥ 5730॥
23सर्वश्रेष्ठ मधु प्रेम गोविंद राधे।
24स्वाभाविक निरपेक्ष बता दे॥ 5731॥