Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 486
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1जिसका फल मिला नाहिं गोविंद राधे।
2वह अप्रारब्ध पाप बता दे॥ 5672॥
3दोनों ही पापों की गोविंद राधे।
4बीज स्वरूपा है वासना बता दे॥ 5673॥
5वासनाओं का भी गोविंद राधे।
6कारण एक अविद्या बता दे॥ 5674॥
7सब का मूल कारण गोविंद राधे।
8भगवद्विमुखता प्रमुख बता दे॥ 5675॥
9शुभ का तात्पर्य गोविंद राधे।
10जगत की प्रीति विधान बता दे॥ 5676॥
11शुभ का तात्पर्य गोविंद राधे।
12दैवी गुणों का विकास बता दे॥ 5677॥
13शुभ अर्थ वह सुख गोविंद राधे।
14विषय ब्राह्म ईश्वरीय बता दे॥ 5678॥
15उपर्युक्त सब गुण गोविंद राधे।
16साधन भक्ति में प्राप्त हों बता दे॥ 5679॥
17भाव भक्ति में तो गोविंद राधे।
18गुण मोक्षलघुताकृत है बता दे॥ 5680॥
19मोक्षलघुताकृत गोविंद राधे।
20अर्थ पाँचों मुक्ति को तुच्छ बता दे॥ 5681॥
21भक्त मुक्ति सालोक्य गोविंद राधे।
22सारूप्य सामीप्य सार्ष्टि बता दे॥ 5682॥
23ज्ञानियों का मोक्ष एक गोविंद राधे।
24सायुज्य या कैवल्य बता दे॥ 5683॥