Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 481
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1जल में तो शब्द स्पर्श गोविंद राधे।
2रूप रस यों वात्सल्य में बता दे॥ 5612॥
3पृथ्वी में पाँच गुण गोविंद राधे।
4शब्द स्पर्श रूप रस गंध बता दे॥ 5613॥
5माधुर्य में भी शान्त गोविंद राधे।
6दास्य, सख्य, वत्सल, मधुर बता दे॥ 5614॥
7शान्त भाव वालों को गोविंद राधे।
8भक्ति प्रेमा भक्ति तक ही पहुँचा दे॥ 5615॥
9दास्य भाव वालों को गोविंद राधे।
10भक्ति राग भक्ति तक ही पहुँचा दे॥ 5616॥
11सख्य भाव वालों को गोविंद राधे।
12भक्ति अनुराग पूर्व तक पहुँचा दे॥ 5617॥
13वात्सल्य वालों को गोविंद राधे।
14भक्ति अनुराग अन्त तक पहुँचा दे॥ 5618॥
15मधुर भाव वालों को गोविंद राधे।
16भक्ति महाभाव भक्ति तक पहुँचा दे॥ 5619॥
17माया मुक्ति हेतु जो गोविंद राधे।
18कर्म, ज्ञान, योग करें धन्य बता दे॥ 5620॥
19प्रेम रस चसका गोविंद राधे।
20जिसको लगा मुक्ति शुक्ति बता दे॥ 5621॥
21याते मुमुक्षुओं ते गोविंद राधे।
22अति धन्य हैं हरिभक्त बता दे॥ 5622॥
23हरि के स्वरूपों में गोविंद राधे।
24कृष्णभक्त और भी हैं धन्य बता दे॥ 5623॥