Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 475
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1प्रेम में ऐसा जादू गोविंद राधे।
2प्रेमी को प्रिय प्रिय प्रेमी बना दे॥ 5540॥
3हरि दे प्रेमी को गोविंद राधे।
4प्रेम के साथ आपु को भी बता दे॥ 5541॥
5प्रेमी दे निज सब गोविंद राधे।
6हरि अपना दे सौदा सस्ता बता दे॥ 5542॥
7प्रेम में ऐसा जादू गोविंद राधे।
8ब्रह्म श्याम को भी दै छाछ नचा दे॥ 5543॥
9ब्रह्म तो था सर्वव्यापी गोविंद राधे।
10प्रेम सर्वव्यापी को मानव बना दे॥ 5544॥
11ब्रह्म तो था निर्लेप गोविंद राधे।
12प्रेम कुबरि में भी लिप्त करा दे॥ 5545॥
13ब्रह्म तो था सदा एक गोविंद राधे।
14प्रेम उसे रास में अनेक बना दे॥ 5546॥
15प्रेम का कमाल देखो गोविंद राधे।
16इच्छा रहित कृष्ण इच्छा बना दे॥ 5547॥
17जीव जब प्रेम पा ले गोविंद राधे।
18जीव मायाधीश हरि को भी नचा दे॥ 5548॥
19प्रेम ते ही हारा है गोविंद राधे।
20प्रेम ते अँगूठाछाप गोपियाँ नचा दें॥ 5549॥
21ज्ञान मिश्र भक्ति ते गोविंद राधे।
22एकत्व मुक्ति प्राप्त होती है बता दे॥ 5550॥
23ऐश्वर्य मिश्र भक्ति गोविंद राधे।
24नारायण का वैकुण्ठ दिला दे॥ 5551॥