Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 474
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1सात्विक भाव बाह्य गोविंद राधे।
2प्रेमी का उर प्रेम आपु बता दे॥ 5528॥
3वेद के धर्मों ते गोविंद राधे।
4कृष्ण प्रेमी होय अतीत बता दे॥ 5529॥
5प्रेमी वेद तजे नाहिं गोविंद राधे।
6वेद ही प्रेमी को तजि दे बता दे॥ 5530॥
7प्रेम का पंथ न्यारा गोविंद राधे।
8सिर काटे वा पै पग धरि के चला दे॥ 5531॥
9प्रेम का पंथ न्यारा गोविंद राधे।
10इहलोक परलोक दोनों नसा दे॥ 5532॥
11लोक परलोक सुख गोविंद राधे।
12प्रेम का पिपासु गंगा में बहा दे॥ 5533॥
13प्रेम का पंथ न्यारा गोविंद राधे।
14लोेक वेद कुल कानि आपु छुड़ा दे॥ 5534॥
15हरिप्रेम पाने में गोविंद राधे।
16वेद के विधि निषेध छूटें बता दे॥ 5535॥
17प्रेमबंध हरि को गोविंद राधे।
18ब्रज छछिया भर छाछ पै नचा दे॥ 5536॥
19प्रेम बन्धन पै गोविंद राधे।
20कोटि मुक्ति सुख न्यौछावर करा दे॥ 5537॥
21प्रेम है पुरोहित गोविंद राधे।
22जीव ब्रह्म दोनों की गाँठ जुरा दे॥ 5538॥
23प्रेमी कर प्रेम डोरी गोविंद राधे।
24पिय है पतंग जैसा चाहे उड़ा दे॥ 5539॥