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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 473

Reading 484 of 516 · Source nos. 5516–5527 · Source PDF 490

1मैं तो भजुँ प्रेम को ही गोविंद राधे।

2याते नित्य मुक्त ब्रह्म बद्ध हो बता दे॥ 5516॥

3प्रेमी के ऋणी बने गोविंद राधे।

4प्रेमास्पद श्रीकृष्ण बता दे॥ 5517॥

5प्रेमी के ऋण ते तो गोविंद राधे।

6कृष्ण उऋण कभू हों ना बता दे॥ 5518॥

7प्रेम के ऋणी हरि गोविंद राधे।

8हरि के ऋणी प्रेमी आपु को बता दे॥ 5519॥

9प्रीति की रीति न्यारी गोविंद राधे।

10बातों ते होती न प्रीति बता दे॥ 5520॥

11प्रेम प्रवचन नहिं गोविंद राधे।

12प्रेम का आचरण मन ते करा दे॥ 5521॥

13जल ऊपर मुख गोविंद राधे।

14शब्द करे, डूबे तो चुप हो बता दे॥ 5522॥

15ऐसे प्रेमसिन्धु महँ गोविंद राधे।

16यदि डूब जाये तो चुप हो बता दे॥ 5523॥

17प्रेम में मन बुद्धि गोविंद राधे।

18डूबें आपु ही तो बताये को बता दे॥ 5524॥

19प्रेम का बाँध जब गोविंद राधे।

20टूट जाये बाहर दीखे बता दे॥ 5525॥

21तब प्रेमतत्वज्ञ गोविंद राधे।

22उर प्रेम का अनुमान लगा दे॥ 5526॥

23बाहर धुवाँ लखि गोविंद राधे।

24अग्नि का ज्यों हो अनुमान बता दे॥ 5527॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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