Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 470
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1कृष्ण सुख तात्पर्य- गोविंद राधे।
2मयी कामना निष्कामता बता दे॥ 5480॥
3भक्त सुख हरि को दे गोविंद राधे।
4हरि सुख भक्त को पुनि लौटा दे॥ 5481॥
5यही है निष्काम गोविंद राधे।
6प्रेम रस का वैचित्र्य बता दे॥ 5482॥
7एक बार एक सखि गोविंद राधे।
8सोरहों सिँगार किया अपना बता दे॥ 5483॥
9सखि की लालसा थी गोविंद राधे।
10प्राणधन देखें अरु सुखी हों बता दे॥ 5484॥
11प्रियतम ढिग आई गोविंद राधे।
12देखा नेत्र बन्द श्याम सोये बता दे॥ 5485॥
13बार बार देखे सोचे गोविंद राधे।
14एक बार आँख खोलि देख लें बता दे॥ 5486॥
15सखी के कर में था गोविंद राधे।
16फूल सुगन्धित कमल बता दे॥ 5487॥
17सखी कर कमल के गोविंद राधे।
18मकरंद को उड़ाने लगी थी बता दे॥ 5488॥
19सखी ने सोचा नेत्र गोविंद राधे।
20परे जो पराग नेत्र खोलें बता दे॥ 5489॥
21उतने में आईं तहँ गोविंद राधे।
22श्री वृषभानुनन्दिनी भी बता दे॥ 5490॥
23राधा ने पूछा सखि गोविंद राधे।
24क्या कर रही है यहाँ साँचु बता दे॥ 5491॥