Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 469
Reading 480 of 516 · Source nos. 5468–5479 · Source PDF 486
1जिसका न आदि अन्त गोविंद राधे।
2वह कहलाता है प्रेम बता दे॥ 5468॥
3प्रेम का स्वरूप तो है गोविंद राधे।
4प्रेम की स्वाभाविक चाह बता दे॥ 5469॥
5सरसता नूतनता गोविंद राधे।
6आतुरता निष्कामता बता दे॥ 5470॥
7कोमलता एक रस गोविंद राधे।
8नित्य वर्धमान अवस्था बता दे॥ 5471॥
9तत्सुखसुखिता की गोविंद राधे।
10इच्छा क्षण क्षण बलवती बता दे॥ 5472॥
11निज सुख हित करे गोविंद राधे।
12भक्ति जो सो है निजभक्त बता दे॥ 5473॥
13हरिसुख हित करे गोविंद राधे।
14भक्ति जो सो है हरिभक्त बता दे॥ 5474॥
15जो कृष्ण सेवा सुख गोविंद राधे।
16चह वे भक्त हैं दुर्लभ बता दे॥ 5475॥
17जो चह कृष्ण-सुख गोविंद राधे।
18वे तो दुर्लभतम हैं बता दे॥ 5476॥
19वस्तुतस्तु वे ही हैं गोविंद राधे।
20पूर्ण निष्काम अरु शान्त बता दे॥ 5477॥
21आत्मसुख कामी का गोविंद राधे।
22चित्त बार बार हो चपल बता दे॥ 5478॥
23सबते महत्वपूर्ण गोविंद राधे।
24सिद्घान्त है निष्कामता बता दे॥ 5479॥