Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 467
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1प्रेमी माँगे स्वाति जल गोविंद राधे।
2पिय दे पत्थर ओले बता दे॥ 5444॥
3ओले पत्थर को गोविंद राधे।
4प्रेमी उपहार ही माने बता दे॥ 5445॥
5ऐसे भक्त कृष्णदत्त गोविंद राधे।
6दुख को माने उपहार बता दे॥ 5446॥
7प्रेम अनन्य ही हो गोविंद राधे।
8साथ ही निरन्तर भी हो बता दे॥ 5447॥
9चातक नीचे का गोविंद राधे।
10गंगा जल ना पिये प्रेम निभा दे॥ 5448॥
11चातक स्वाती का गोविंद राधे।
12जल पिये बनि के अनन्य दिखा दे॥ 5449॥
13ऐसे ही तू भी जीव गोविंद राधे।
14हरि का अनन्य भक्त बनि के दिखा दे॥ 5450॥
15घन गरजे किन्तु गोविंद राधे।
16चातक उर प्रेम घटे ना बता दे॥ 5451॥
17घन मारे पाहन गोविंद राधे।
18चातक उर ना हो रोष बता दे॥ 5452॥
19गुण दोष देखे बिनु गोविंद राधे।
20छिन छिन उर हरि प्रेम बढ़ा दे॥ 5453॥
21निष्ठुरता है गुण गोविंद राधे।
22निष्ठुरता तो प्रेम और बढ़ा दे॥ 5454॥
23निष्ठुरता है गुण गोविंद राधे।
24निष्ठुरता तो निष्कामता सिखा दे॥ 5455॥