Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 466
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1जग की तो नारी चह गोविंद राधे।
2मेरा पति और नारी देखे ना बता दे॥ 5432॥
3हरि प्रेमिका तो चाहे गोविंद राधे।
4हरि सुख, नारी कोई भी हो बता दे॥ 5433॥
5हरि प्रेयसी चाहे गोविंद राधे।
6हरि सब को ही निज प्रेयसी बना दे॥ 5434॥
7प्रेमी सुनि निन्दा को गोविंद राधे।
8कहे यह प्रेम व्यंग उक्ति बता दे॥ 5435॥
9प्रेम में ना गुण देखो गोविंद राधे।
10गुण जाय प्रेम जाय प्रेमी को बता दे॥ 5436॥
11प्रिय में तो गुण अरु गोविंद राधे।
12अवगुण चिन्तन हो ना बता दे॥ 5437॥
13प्रेमी प्रेमास्पद के गोविंद राधे।
14दोष में भी गुण ही देखे बता दे॥ 5438॥
15एक ने भक्त ते गोविंद राधे।
16पूछा श्रीकृष्ण कैसे ईश्वर बता दे॥ 5439॥
17मैया के डर ते गोविंद राधे।
18बार बार वो तो झूठ बोलें बता दे॥ 5440॥
19भक्त ने कहा कृष्ण गोविंद राधे।
20कितने उदार भक्त वश्य हैं बता दे॥ 5441॥
21माना श्याम चौर जार गोविंद राधे।
22प्रेम अवगुण में भी गुण को दिखा दे॥ 5442॥
23प्रेमी है चातक गोविंद राधे।
24प्रियतम स्वाती का मेघ बता दे॥ 5443॥