Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 465
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1मोक्ष की इच्छा नाहिं गोविंद राधे।
2नरक का भय नाहिं प्रेम बता दे॥ 5420॥
3कृष्ण सर्वव्यापक गोविंद राधे।
4प्रेम बढ़ावो प्रेम प्रकट करा दे॥ 5421॥
5“तेरा मैं हूँ” जनि सोचो गोविंद राधे।
6“मेरा तू है” सोचो यह प्रेम बढ़ा दे ॥ 5422॥
7प्रेम खिलौना नहिं गोविंद राधे।
8सिर काटि गेंद बना खेलना बता दे॥ 5423॥
9प्रेम का पंथ ऐसा गोविंद राधे।
10तलवार धार पै चलना बता दे॥ 5424॥
11विप्रयोग दुख में गोविंद राधे।
12अपमान में जो सुखी प्रेमी बता दे॥ 5425॥
13सच्चा प्रेमी यह चह गोविंद राधे।
14पिय करे मेरा अपमान बता दे॥ 5426॥
15प्रेमी का कठोर बोल गोविंद राधे।
16लगे प्रेम की मीठी गाली बता दे॥ 5427॥
17सच्चा प्रेमी नहिं चह गोविंद राधे।
18पिय ते कछु सत्कार बता दे॥ 5428॥
19सच्चा प्रेमी यह चह गोविंद राधे।
20मेरा पिय मेरा प्रेम जाने ना बता दे॥ 5429॥
21सच्चा प्रेमी यह चह गोविंद राधे।
22मैं चाहूँ पिय पिय चाहे ना बता दे॥ 5430॥
23सच्चा प्रेमी चह बस गोविंद राधे।
24कैसे सुख दूँ निज पिय को बता दे॥ 5431॥