Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 464
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1कभी कभी आग ते गोविंद राधे।
2धुवाँ भी निकल जाये बाहर बता दे॥ 5408॥
3प्रेम कभू रुके नहिं गोविंद राधे।
4रोकने की शक्ति हरि में भी ना बता दे॥ 5409॥
5ध्वंस हेतु हो भी तो भी गोविंद राधे।
6घटे नाहिं बाढ़ै सदा प्रेम बता दे॥ 5410॥
7किसी अपराध ते भी गोविंद राधे।
8जिसका न हो ह्रास प्रेम बता दे॥ 5411॥
9अत्यधिक नमन ते भी गोविंद राधे।
10जिसकी न हो वृद्धि प्रेम बता दे॥ 5412॥
11प्रेम सरोवर विमल गोविंद राधे।
12विमल मन को इसमें नहला दे॥ 5413॥
13प्रेम सर निर्मल गोविंद राधे।
14लोक वेद कानि जल मैला करा दे॥ 5414॥
15प्रेम सर निर्मल गोविंद राधे।
16निज सुख पग जल मैला करा दे॥ 5415॥
17प्रेम में न हेतु रहे गोविंद राधे।
18हेतु मिटे प्रेम मिटे प्रेमी को बता दे॥ 5416॥
19कृष्ण का विशुद्ध प्रेम गोविंद राधे।
20बिना हेतु के ही हो प्रकट बता दे॥ 5417॥
21प्रेम क्यों करते हो गोविंद राधे।
22उत्तर दो प्रेम हित ही बता दे॥ 5418॥
23प्रेम क्यों करते हो गोविंद राधे।
24उत्तर पियसुख हेतु बता दे॥ 5419॥