Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 463
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1सबके हृदय में है गोविंद राधे।
2प्रेम किन्तु जग में है विकृत बता दे॥ 5396॥
3सुख में बढ़े ना जो गोविंद राधे।
4दुख में घटे ना जो प्रेम बता दे॥ 5397॥
5जग का तो सारा प्रेम गोविंद राधे।
6एक समान नाहिं रहता बता दे॥ 5398॥
7जग प्रेम है ऐसा गोविंद राधे।
8क्षण क्षण घटता ही जाये बता दे॥ 5399॥
9क्षण क्षण बाढ़ै प्रेम गोविंद राधे।
10क्षण क्षण घटे वाको कामना बता दे॥ 5400॥
11प्रेम रस प्यास ऐसी गोविंद राधे।
12पीते जाओ पीते जाओ प्यास बढ़ा दे॥ 5401॥
13चन्द्र पूर्णिमा तो होती गोविंद राधे।
14प्रेम पूर्णिमा कभु होती ना बता दे॥ 5402॥
15प्रेमी सदा ही सोचे गोविंद राधे।
16मुझमें अभी है कमी प्रेम की बता दे॥ 5403॥
17हरि प्रेमी सोचे नहिं गोविंद राधे।
18मेरा प्रेम तो पूर्ण हो गया बता दे॥ 5404॥
19प्रेम की सीमा नहिं गोविंद राधे।
20किन्तु बढ़ता ही जाये सर्वदा बता दे॥ 5405॥
21संकोच सीमा जामें गोविंद राधे।
22वह प्रेम प्रेम नहिं होता बता दे॥ 5406॥
23प्रेम की आग तो गोविंद राधे।
24उर में धधकती रहे सदा ही बता दे॥ 5407॥