Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 462
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1प्रेम देश, काल, वस्तु गोविंद राधे।
2भाषा, क्रिया आदि ते स्वतन्त्र बता दे॥ 5384॥
3प्रेम है अलौकिक गोविंद राधे।
4याते प्रेम लौकिक बुद्धि पर बता दे॥ 5385॥
5प्रेम की विचित्र गति गोविंद राधे।
6प्रेम कहीं देना कहीं छीनना बता दे॥ 5386॥
7कृष्ण निज प्रेमी की गोविंद राधे।
8लेते हैं परीक्षा बार बार बता दे॥ 5387॥
9कृष्ण कृपा का मर्म गोविंद राधे।
10कोई भी नहीं जान सका है बता दे॥ 5388॥
11कृष्ण निज प्रेमी को गोविंद राधे।
12कभू जग दें कभू छीनें बता दे॥ 5389॥
13द्रवीभूत मन पै गोविंद राधे।
14अभिव्यक्त कृष्ण ही प्रेम है बता दे॥ 5390॥
15कृष्ण प्रेमयुक्त मति गोविंद राधे।
16प्राण दै के भी मिले तो कोइ ला दे॥ 5391॥
17प्रेम अधिकारी सोई गोविंद राधे।
18दुख को सुख ते प्यारा बता दे॥ 5392॥
19निजसुख चाहे जो गोविंद राधे।
20प्रेम पथ में पैर धरे ना बता दे॥ 5393॥
21प्रेम में तो निजसुख गोविंद राधे।
22जो चाहे सो है गणिका बता दे॥ 5394॥
23प्रेम एक सा ना रहे गोविंद राधे।
24घटे नाहिं बढ़े सदा प्रेम बता दे॥ 5395॥