Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 460
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1ह्लादिनी संविदंश गोविंद राधे।
2शुद्ध सत्ववृत्ति दिव्यप्रेम बता दे॥ 5360॥
3स्वरूप शक्ति ते ही गोविंद राधे।
4दिव्य मन दिव्यप्रेम पाता है बता दे॥ 5361॥
5प्रेमविष ऐसा है गोविंद राधे।
6कालकूट विष को भी नीचा दिखा दे॥ 5362॥
7प्रेमामृत ऐसा है गोविंद राधे।
8स्वर्ग की सुधा को भी फीका बना दे॥ 5363॥
9प्रेम है अमृत गोविंद राधे।
10प्रेमी भी प्रिय भी है अमृत बता दे॥ 5364॥
11प्रेमी प्रेम प्रियतम गोविंद राधे।
12तीनों पकारादि श्रेय हैं बता दे॥ 5365॥
13तीनों में सर्वश्रेष्ठ गोविंद राधे।
14प्रेम पंचम पुरुषार्थ बता दे॥ 5366॥
15गुणों ते रहित भी हो गोविंद राधे।
16कामना रहित भी हो प्रेम बता दे॥ 5367॥
17प्रतिक्षण वर्धमान गोविंद राधे।
18अविच्छिन्न भी हो वाय प्रेम बता दे॥ 5368॥
19सूक्ष्मतर अनुभवरूप गोविंद राधे।
20छे विशेषतायें हैं प्रेम में बता दे॥ 5369॥
21प्राण बिनु तनु जैसे गोविंद राधे।
22कृष्ण प्रेम बिनु वैसे जीव बता दे॥ 5370॥
23गंध बिनु पुष्प जैसे गोविंद राधे।
24कृष्णप्रेम बिनु वैसे ज्ञान बता दे॥ 5371॥