Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 459
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1सब ते बड़ा है प्रेम गोविंद राधे।
2मुक्त आत्मा को पुनि तन बनवा दे॥ 5348॥
3कोटि सिद्ध मुक्तों में गोविंद राधे।
4बिरला ही कोई प्रेम पाये बता दे॥ 5349॥
5प्रेम का निरूपक गोविंद राधे।
6अन्त में आपु हार मान ले बता दे॥ 5350॥
7प्रेम कृष्ण स्वरूप गोविंद राधे।
8याते अनिर्वचनीय है बता दे॥ 5351॥
9संसारी प्रेम का भी गोविंद राधे।
10शब्दों ते निर्वचन हो ना बता दे॥ 5352॥
11पुनि दिव्यप्रेम का गोविंद राधे।
12कैसे निरूपण होगा बता दे॥ 5353॥
13प्रेम मन गोचर गोविंद राधे।
14सत् भी अनिर्वचनीय बता दे॥ 5354॥
15प्रेम का निरूपण गोविंद राधे।
16शब्दों ते करना असम्भव बता दे॥ 5355॥
17प्रेम का निरूपण जो गोविंद राधे।
18शब्दों ते हो सो तो धोखा बता दे॥ 5356॥
19नारद बताये प्रेम गोविंद राधे।
20अनुभवरूप गुड़ गूँगे का बता दे॥ 5357॥
21गूँगे का गुड़ जैसा गोविंद राधे।
22प्रेम का निरूपण असम्भव बता दे॥ 5358॥
23प्रेम में हो ज्ञान लय गोविंद राधे।
24ज्ञान बिनु कौन हो निरूपक बता दे॥ 5359॥