Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 456
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1प्रेम में त्याग की गोविंद राधे।
2बात सुनि डरि जाये विषयी बता दे॥ 5312॥
3प्रेम में तड़पन गोविंद राधे।
4बात सुनि डरि जाये विषयी बता दे॥ 5313॥
5प्रेम अग्नि ज्वाला है गोविंद राधे।
6येहि लखि डर भागे विषयी बता दे॥ 5314॥
7एक बार ज्वाला में गोविंद राधे।
8कूद परे पुनि पाये रस ही बता दे॥ 5315॥
9जग विषयासक्ति गोविंद राधे।
10कृष्णप्रेम में मुख्य बाधा बता दे॥ 5316॥
11जग विषयासक्ति गोविंद राधे।
12कारण तत्वज्ञानाभाव बता दे॥ 5317॥
13जग सब हरि का है गोविंद राधे।
14हमने किया मिथ्या स्वत्व बता दे॥ 5318॥
15उस मिथ्या स्वत्व को ही गोविंद राधे।
16जीव को हटाना है तत्व बता दे॥ 5319॥
17प्रेम धन सच्चा धन गोविंद राधे।
18और धन मन में अभिमान बढ़ा दे॥ 5320॥
19प्रेम रस चाहे अरु गोविंद राधे।
20मान भी चाहे असंभव बता दे॥ 5321॥
21ब्रह्म आनन्द प्रेम गोविंद राधे।
22ब्रह्म के ही हैं तीनों रूप बता दे॥ 5322॥
23सब ते बड़ा है प्रेम गोविंद राधे।
24ब्रह्म आनन्द दोनों दास बता दे॥ 5323॥