Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 454
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1प्रेम का स्वरूप तो है गोविंद राधे।
2कैसा भी पराया हो अपना बना दे॥ 5288॥
3प्रेम का स्वभाव तो है गोविंद राधे।
4दुख को भी सुख का सिन्धु बना दे॥ 5289॥
5जहाँ जहाँ प्रेम रहे गोविंद राधे।
6तहाँ तहाँ सुख ही रहेगा बता दे॥ 5290॥
7दूर को निकट लाये गोविंद राधे।
8देर को तुरत प्रेम तत्व बता दे॥ 5291॥
9जो प्रेम देरी अरु गोविंद राधे।
10दूरी ते घटे वह प्रेम ना बता दे॥ 5292॥
11प्रेम बढ़ता ही रहे गोविंद राधे।
12संयोग हो या वियोग बता दे॥ 5293॥
13कामनाएँ तजो भजो गोविंद राधे।
14हो अकाम तब गुरु प्रेम दिला दे॥ 5294॥
15शुद्ध प्रेम पाना हो तो गोविंद राधे।
16देना देना सीखो लेना लेना भुला दे॥ 5295॥
17भक्त भगवान दोनों गोविंद राधे।
18देना देना जानें लेना जानें ना बता दे॥ 5296॥
19जग जाने लेना लेना गोविंद राधे।
20जाने न देना प्रेम पाये ना बता दे॥ 5297॥
21जग जाने लेना याते गोविंद राधे।
22काऊ की काऊ ते बने ना बता दे॥ 5298॥
23लेना लेना सीखा सदा गोविंद राधे।
24देना देना पाठ अब मन को पढ़ा दे॥ 5299॥