Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 453
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1अशुद्ध चिन्तन गोविंद राधे।
2मन को अशुद्ध करे और भी बता दे॥ 5276॥
3प्रेम हरि रूप ही है गोविंद राधे।
4हरि भी है प्रेम स्वरूप बता दे॥ 5277॥
5प्रेम प्राप्त होने पै गोविंद राधे।
6प्रेमी को दस दिशा सुख है बता दे॥ 5278॥
7प्रेमी की दशा एक गोविंद राधे।
8सर्वत्र देखे श्रीकृष्ण को बता दे॥ 5279॥
9प्रेमी की दशा एक गोविंद राधे।
10सब में देखे श्रीकृष्ण को बता दे॥ 5280॥
11प्रेमी का संसार गोविंद राधे।
12रहता तो है पूर्ववत ही बता दे॥ 5281॥
13किन्तु कृष्ण प्रेमी का गोविंद राधे।
14मन रहता है कृष्ण में बता दे॥ 5282॥
15जहाँ प्रेम वहाँ सुख गोविंद राधे।
16जहाँ द्वेष वहाँ दुख ही है बता दे॥ 5283॥
17प्रेमी का बैरी नाहिं गोविंद राधे।
18क्योंकि सब में हरि देखे बता दे॥ 5284॥
19हरि प्रेमी प्रेम सोचे गोविंद राधे।
20प्रेम देखे प्रेम सुने नित ही बता दे॥ 5285॥
21सुख साधन का तो गोविंद राधे।
22प्रेम सोपाधिक नाम बता दे॥ 5286॥
23सुख रूप कृष्ण प्रेम गोविंद राधे।
24नाम निरुपाधिक प्रेम बता दे॥ 5287॥