लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 452

Reading 463 of 516 · Source nos. 5264–5275 · Source PDF 469

1हरि गुरु ही हैं शुद्ध गोविंद राधे।

2उनते जुड़े जो मन प्रेम बता दे॥ 5264॥

3कृष्ण प्रेम पाना है गोविंद राधे।

4जहाँ भी जैसे भी प्राप्त हो बता दे॥ 5265॥

5हरि ते जुड़ा प्रेम गोविंद राधे।

6किसी भी भाव ते हो प्रेम है बता दे॥ 5266॥

7सूधी सी बात है गोविंद राधे।

8जाते हो प्रेम मिले सोई बता दे॥ 5267॥

9स्वयं प्रकाश्य प्रेम गोविंद राधे।

10पात्र लखि आपु ही प्रकट हो बता दे॥ 5268॥

11नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम गोविंद राधे।

12शुद्ध चित्त में हो उदय बता दे॥ 5269॥

13प्रेम रहे मन में ही गोविंद राधे।

14मन रहे हरि के वश में बता दे॥ 5270॥

15मन तो है मायिक गोविंद राधे।

16दिव्य प्रेम ठहरेगा कैसे बता दे॥ 5271॥

17पात्र है दिव्य मन गोविंद राधे।

18उसी में दिव्य प्रेम प्रकटे बता दे॥ 5272॥

19सिंहिनी का दूध तो गोविंद राधे।

20स्वर्ण के पात्र में ही टिकता बता दे॥ 5273॥

21ऐसे ही दिव्यप्रेम गोविंद राधे।

22शुद्ध दिव्य मन में ही टिकता बता दे॥ 5274॥

23शुद्ध चिन्तन करो गोविंद राधे।

24वाते हृदय शुद्ध होगा बता दे॥ 5275॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

Source edition and PDF · Text version