Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 451
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1दिव्यप्रेम पाने पै गोविंद राधे।
2तम पूर्ण जाये हो प्रकाश बता दे॥ 5252॥
3प्रेम का विकास हो तो गोविंद राधे।
4स्वार्थ का विनाश हो जाय बता दे॥ 5253॥
5जब लौं न त्यागा स्वार्थ गोविंद राधे।
6तब लौं न प्रेम श्रीकृष्ण में बता दे॥ 5254॥
7स्वार्थ का पुजारी जीव गोविंद राधे।
8प्रेम पथ में स्वार्थ गंध ना बता दे॥ 5255॥
9लोक अरु परलोक गोविंद राधे।
10प्रेम पथ पै दो कलंक बता दे॥ 5256॥
11प्रेम में स्वार्थ नाहिं गोविंद राधे।
12स्वार्थ में ही छल का वास बता दे॥ 5257॥
13मन हो विशुद्ध जब गोविंद राधे।
14प्रेम भी तब हो विशुद्ध बता दे॥ 5258॥
15ज्योँ ज्योँ बाढ़ै प्रेम गोविंद राधे।
16त्योँ त्योँ हो मन भी शुद्ध बता दे॥ 5259॥
17गुणरहित प्रेम अर्थ गोविंद राधे।
18त्रिगुण भोग ते हो विराग बता दे॥ 5260॥
19प्रेम शब्द का प्रयोग गोविंद राधे।
20हरि हरिजन में युक्त बता दे॥ 5261॥
21प्रेम है शुद्ध याते गोविंद राधे।
22शुद्ध ते जुड़े तो उसे प्रेम बता दे॥ 5262॥
23प्रेम है शुद्ध याते गोविंद राधे।
24जुड़े जो अशुद्ध ते तो मोह बता दे॥ 5263॥