Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 450
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1भक्ति है कृष्ण प्रिया गोविंद राधे।
2याते भक्ति हुई काम माता बता दे॥ 5240॥
3काम की पूज्या भक्ति गोविंद राधे।
4काम की भोग्या ना भक्ति बता दे॥ 5241॥
5सुख साधन का तो गोविंद राधे।
6प्रेम है अनित्य घटमान बता दे॥ 5242॥
7जब तक भूख है गोविंद राधे।
8तब तक ही भोज्य सुख दे बता दे॥ 5243॥
9जब तक है प्यास गोविंद राधे।
10तब तक जल में है सुख भी बता दे॥ 5244॥
11जब तक काम है गोविंद राधे।
12तब तक भोग्य में है सुख भी बता दे॥ 5245॥
13किन्तु सुख में तो गोविंद राधे।
14सदा सर्वत्र ही प्रेम बता दे॥ 5246॥
15सुख रूप श्रीकृष्ण गोविंद राधे।
16याते हो कृष्ण ते ही प्रेम बता दे॥ 5247॥
17जो प्रेम हरि जग गोविंद राधे।
18दोनों में हो वह प्रेम ना बता दे॥ 5248॥
19काम कहें जगप्रेम गोविंद राधे।
20प्रेम कहें शुद्ध हरि गुरु ते बता दे॥ 5249॥
21काम अरु प्रेम दोनों गोविंद राधे।
22एक ठाम रहि नहिं सकते बता दे॥ 5250॥
23ज्योँ ज्योँ हो प्रेम त्योँ त्योँ गोविंद राधे।
24आपु भजि जाये जग काम बता दे॥ 5251॥