Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 448
Reading 459 of 516 · Source nos. 5216–5227 · Source PDF 465
1किन्तु विज्ञ जौहरी तो गोविंद राधे।
2काँच को काँच हीरा हीरा को बता दे॥ 5216॥
3ऐसे ही काम प्रेम गोविंद राधे।
4एक सा दीखे अल्पज्ञ को बता दे॥ 5217॥
5किन्तु ब्रज रसिक तो गोविंद राधे।
6काम प्रेम भेद जाने क्षण में बता दे॥ 5218॥
7काम प्रेम पहिचान गोविंद राधे।
8क्रिया ते नहीं हो भाव ते बता दे॥ 5219॥
9काम की जैसी क्रिया गोविंद राधे।
10प्रेम की भी वैसी क्रिया होवे बता दे॥ 5220॥
11जब लौं कामना हो गोविंद राधे।
12देह में केन्द्रित काम बता दे॥ 5221॥
13जब वह कामना हो गोविंद राधे।
14कृष्ण में केन्द्रित प्रेम बता दे॥ 5222॥
15जहाँ श्याम काम नाहिं गोविंद राधे।
16जहाँ काम तहाँ श्याम रहें ना बता दे॥ 5223॥
17प्रेम है सूर्य सम गोविंद राधे।
18काम अन्धकार है विरोध बता दे॥ 5224॥
19काम निज सुख हित गोविंद राधे।
20प्रेम प्रियतम सुख हित हो बता दे॥ 5225॥
21अज्ञ जीव काम को ही गोविंद राधे।
22प्रेम मानि दुख पावे नित्य बता दे॥ 5226॥
23जीव के लिए तो काम गोविंद राधे।
24विष युक्त मधु के समान है बता दे॥ 5227॥