Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 445
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1बदले का प्यार ऐसा गोविंद राधे।
2एक दिन प्यार को भी खार बना दे॥ 5180॥
3हरि ते न जग माँगो गोविंद राधे।
4एक दिन माँगना तो नास्तिक बना दे॥ 5181॥
5हरि ते जो जग माँगो गोविंद राधे।
6हरि यदि दे भी दे तो लोभ बढ़ा दे॥ 5182॥
7माँगना बुरा है अति गोविंद राधे।
8माँगना तो ब्रह्म को भी बामन बना दे॥ 5183॥
9हरि ते न माँगो कछु गोविंद राधे।
10मन दै के हरि को भिखारी बना दे॥ 5184॥
11प्यार इतना करो कि गोविंद राधे।
12श्याम आपु आ के पूछें कहु तोहिं का दे॥ 5185॥
13प्यार इतना करो कि गोविंद राधे।
14भाजे भाजे आवें दोनों गलबँहियाँ दे॥ 5186॥
15हरि का तो सुत हूँ मैं गोविंद राधे।
16पिता वस्तु सुत की ही पिता को बता दे॥ 5187॥
17हरि बोल हरि बोल गोविंद राधे।
18वासना का बिस्तर गोल करा दे॥ 5188॥
19हरि को बिठा दे उर गोविंद राधे।
20जग वासना को उर बिच वास ना दे॥ 5189॥
21हरि हैं अकिंचन के गोविंद राधे।
22याते अकिंचन भाव मन का बना दे॥ 5190॥
23निज इच्छा बल तजो गोविंद राधे।
24हरि गुरु इच्छा को ही इच्छा बना दे॥ 5191॥