Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 444
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1आत्मा तो शुद्ध “मैं” है गोविंद राधे।
2देह तो अशुद्ध “मैं” है सार बता दे॥ 5168॥
3आत्मा तो शुद्ध “मैं” है गोविंद राधे।
4देह “मैं” नहीं मेरा देह है बता दे॥ 5169॥
5जीव तो है नित्य दास गोविंद राधे।
6मन यह मान ले तो काम बना दे॥ 5170॥
7जब ते विमुख हुये गोविंद राधे।
8मैं देह ही हूँ माया अज्ञान ला दे॥ 5171॥
9आत्मा है चेतन गोविंद राधे।
10देह तो है जड़ पंचभूत का बता दे॥ 5172॥
11आत्मा है चेतन गोविंद राधे।
12चेतन चेतन परमात्मा बता दे॥ 5173॥
13आत्मा तो रहे नित गोविंद राधे।
14परमात्मा में नहिं दूर बता दे॥ 5174॥
15तू तो दिव्य आत्मा है गोविंद राधे।
16जग कामना की पूर्ति कछु काम ना दे॥ 5175॥
17जग कामना को तजु गोविंद राधे।
18हरि कामना को निज कामना बना दे॥ 5176॥
19जग कामना ना जाये गोविंद राधे।
20जग कामना हरि कामना बना दे॥ 5177॥
21जग कामना जाये गोविंद राधे।
22जब बनि जाये हरि कामना बता दे॥ 5178॥
23पिय ते न माँगो कछु गोविंद राधे।
24कामना अपूर्ति तो प्रेम नसा दे॥ 5179॥