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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 443

Reading 454 of 516 · Source nos. 5156–5167 · Source PDF 460

1जग नाता तब तक गोविंद राधे।

2जब तक स्वार्थ सिद्ध होवे बता दे॥ 5156॥

3किसी के सुख हेतु गोविंद राधे।

4कोई भी प्यार नाहिं करता बता दे॥ 5157॥

5अपने ही सुख हेतु गोविंद राधे।

6प्यार सब करते हैं सब ते बता दे॥ 5158॥

7जितना झुकेगा जग गोविंद राधे।

8उतना ही स्वार्थ उर होगा बता दे॥ 5159॥

9जग लखि स्वार्थी गोविंद राधे।

10हरि गुरु को भी मन स्वार्थी बता दे॥ 5160॥

11स्वार्थ सिद्ध होने पै ही गोविंद राधे।

12होगा परार्थ यह ज्ञान करा दे॥ 5161॥

13जब लौं स्वार्थ सिद्ध ना हो गोविंद राधे।

14परार्थ की बात करना धोखा बता दे॥ 5162॥

15जब लौं न मिले श्याम गोविंद राधे।

16तब लौं परोपकार धोखा बता दे॥ 5163॥

17सारा विश्व स्वार्थी है गोविंद राधे।

18सच्चा परार्थी हरि गुरु दो बता दे॥ 5164॥

19स्वार्थी हैं सुर नर गोविंद राधे।

20हरि गुरु ही परमार्थी बता दे॥ 5165॥

21जग जो कृपा करे तो गोविंद राधे।

22स्वार्थ सिद्ध करि वाय अँगुठा दिखा दे॥ 5166॥

23“मैं” तो हूँ आत्मा गोविंद राधे।

24आत्मा की आत्मा परमात्मा बता दे॥ 5167॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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