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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 442

Reading 453 of 516 · Source nos. 5144–5155 · Source PDF 459

1स्वार्थ ही है परमार्थ गोविंद राधे।

2भोले लोग दोनों को पृथक बता दे॥ 5144॥

3स्वार्थ को बुरा न मानो गोविंद राधे।

4स्वार्थ अर्थ जानो बिगरी बना दे॥ 5145॥

5जगत में प्रेम नहिं गोविंद राधे।

6याते काऊ ते प्रेम चहु ना बता दे॥ 5146॥

7प्रेम के भिखारी सब गोविंद राधे।

8प्रेम देने का स्वाँग झूठा बता दे॥ 5147॥

9भिखारी भिखारी घर गोविंद राधे।

10माँगे भीख वो भी भिखारी भीख का दे॥ 5148॥

11प्रेम प्रेम सब कहें गोविंद राधे।

12पूछो प्रेम परिभाषा तो ना बता दे॥ 5149॥

13दूँगा प्रेम सब कहें गोविंद राधे।

14प्रेमतत्व जानें नहिं तोहिं प्रेम का दें॥ 5150॥

15जिस धनवान पास गोविंद राधे।

16धन है वही धन देगा बता दे॥ 5151॥

17ऐसे ही प्रेमधनी गोविंद राधे।

18हरि गुरु ते मिले प्रेम बता दे॥ 5152॥

19जगत के प्रेम का गोविंद राधे।

20आधार एकमात्र स्वार्थ बता दे॥ 5153॥

21जग स्वार्थ बिनु ना दे गोविंद राधे।

22हरि गुरु स्वार्थ बिनु प्रेमसुधा दें॥ 5154॥

23हरि ते न प्यार किया गोविंद राधे।

24जग ते किया जग अँगुठा दिखा दे॥ 5155॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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