Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 441
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1चारों धाम काहे जाये गोविंद राधे।
2तेरा श्याम तेरे उर बैठा है बता दे॥ 5132॥
3वृन्दावन वास करे गोविंद राधे।
4विषय भोग नाम अपराध करा दे॥ 5133॥
5हरि बैठे उर में हैं गोविंद राधे।
6तू तो मिलन की प्यास बढ़ा दे॥ 5134॥
7गो दूध गो हित व्यर्थ गोविंद राधे।
8दूध दुह के पिला दे पुष्ट बना दे॥ 5135॥
9ऐसे ही उर हरि गोविंद राधे।
10प्रेम ते तू हरि को भी प्रकट करा दे॥ 5136॥
11साँचो स्वार्थ हरि ते ही गोविंद राधे।
12मिलेगा यह ज्ञान प्यार करा दे॥ 5137॥
13स्वार्थ सिद्धि विश्वास गोविंद राधे।
14तन मन प्राण सब अर्पण करा दे॥ 5138॥
15स्वार्थ ते ही प्रेम होवे गोविंद राधे।
16सच्चा स्वार्थ ज्ञान सच्चा प्रेम करा दे॥ 5139॥
17“स्व” का अर्थ देह माना गोविंद राधे।
18“देह” अर्थ विषयभोग पतन करा दे॥ 5140॥
19“स्व” का अर्थ आत्मा है गोविंद राधे।
20“आत्मा” का अर्थ प्रेम सबको बता दे॥ 5141॥
21“स्व” शब्द का सच्चा गोविंद राधे।
22अर्थ “वसुधैव कुटुम्बकं” बता दे॥ 5142॥
23स्वार्थ परमार्थ दोनों गोविंद राधे।
24यही ज्ञान सच्चा ज्ञान मन को करा दे॥ 5143॥