Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 440
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1कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।
2कृष्ण को भी प्रेमी का दास बना दे॥ 5120॥
3कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।
4भुक्ति मुक्ति वैकुण्ठ सुख ठुकरा दे॥ 5121॥
5कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।
6चिन्मय गोलोक धाम दिला दे॥ 5122॥
7हरि में हो हरि भाव गोविंद राधे।
8ऐसा प्रेम तो तोहिं हरि ते मिला दे॥ 5123॥
9हरि में हो नर भाव गोविंद राधे।
10ऐसा प्रेम भी तोहिं हरि ते मिला दे॥ 5124॥
11जग में हो हरि भाव गोविंद राधे।
12ऐसा प्रेम भी तोहिं हरि ते मिला दे॥ 5125॥
13जग में हो जग भाव गोविंद राधे।
14ऐसा प्रेम तो तेरा पतन करा दे॥ 5126॥
15सर्वदेश सर्वकाल गोविंद राधे।
16सर्ववस्तु में हो हरि ध्यान बता दे॥ 5127॥
17दूध में है घृत जैसे गोविंद राधे।
18ऐसे जग में भी व्याप्त हरि हैं बता दे॥ 5128॥
19हरि तो हैं सर्वत्र गोविंद राधे।
20व्याप्त समान रूप ते ही बता दे॥ 5129॥
21यों तो हरि व्यापक हैं गोविंद राधे।
22किन्तु प्रकट होते भक्ति ते बता दे॥ 5130॥
23जो हरि तेरे उर गोविंद राधे।
24सोइ हरि हैं गोलोक में बता दे॥ 5131॥