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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 439

Reading 450 of 516 · Source nos. 5108–5119 · Source PDF 456

1बिनु कारण कृष्ण गोविंद राधे।

2करुणावरुणालय हैं बता दे॥ 5108॥

3कृष्ण करुणामय गोविंद राधे।

4भक्त पाछे चलि पद धूरि लगा दे॥ 5109॥

5भक्तों के क्रीतदास गोविंद राधे।

6पतितों ते प्रेम करें कृष्ण बता दे॥ 5110॥

7दीनबन्धु दीनानाथ गोविंद राधे।

8कृष्ण हैं अधमउधारन बता दे॥ 5111॥

9उपर्युक्त तत्वज्ञान गोविंद राधे।

10आपु श्रीकृष्ण ते प्रेम करा दे॥ 5112॥

11कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।

12जग प्रेम को बिनु श्रम ही मिटा दे॥ 5113॥

13कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।

14दैवी गुणों को बिनु चाहे बुला दे॥ 5114॥

15कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।

16कृष्णज्ञान जगवैराग्य दिला दे॥ 5115॥

17कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।

18पंचकोश को भस्मसात करा दे॥ 5116॥

19कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।

20प्रेमी का उर निर्ग्रन्थ बना दे॥ 5117॥

21कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।

22संचित पाप पुण्य भस्म करा दे॥ 5118॥

23कृष्णप्रेम आपु ही गोविंद राधे।

24माया का अत्यन्ताभाव करा दे॥ 5119॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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