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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 434

Reading 445 of 516 · Source nos. 5048–5059 · Source PDF 451

1इष्ट गुरु भक्ति में तो गोविंद राधे।

2भाव बनाओ अनन्य बता दे॥ 5048॥

3इष्ट गुरु भक्ति के गोविंद राधे।

4विपरीत में उदासीन बता दे॥ 5049॥

5विरोध करने ते गोविंद राधे।

6हरि भक्ति आपु ही छूटे बता दे॥ 5050॥

7विरोध करने ते गोविंद राधे।

8मन जले, हो भी अशुद्ध बता दे॥ 5051॥

9अन्य आश्रयों का गोविंद राधे।

10मन ते त्याग अनन्यता बता दे॥ 5052॥

11किसी को धन बल गोविंद राधे।

12किसी को तो कर्म बल है बता दे॥ 5053॥

13कर्म आश्रय दो हैं गोविंद राधे।

14बहिरंग अरु अन्तरंग बता दे॥ 5054॥

15जग की संपत्ति गोविंद राधे।

16है बहिरंग कर्म आश्रय बता दे॥ 5055॥

17योग, जप, तप आदि गोविंद राधे।

18है अन्तरंग कर्म आश्रय बता दे॥ 5056॥

19स्वबल आश्रय भी तो गोविंद राधे।

20है अनन्यता का बाधक बता दे॥ 5057॥

21इष्टबल आश्रय गोविंद राधे।

22एकमात्र हो तो अनन्य बता दे॥ 5058॥

23इष्टबल भाव यह गोविंद राधे।

24इष्ट नाम, रूप, लीला, जन हैं बता दे॥ 5059॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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