Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 421
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1तो भी कर्मकर्ता को गोविंद राधे।
2ईश्वर दे फल कर्म का बता दे॥ 4892॥
3जो कर्म ही ना करे गोविंद राधे।
4ईश्वर वाय फल का दे बता दे॥ 4893॥
5जब सब ही जीव गोविंद राधे।
6निज कर्म के फल भोगें बता दे॥ 4894॥
7तो फिर इन्द्र की गोविंद राधे।
8पूजा क्यों की जाये बता दे॥ 4895॥
9पूर्व संस्कारों को गोविंद राधे।
10भोगना पड़ेगा सबको ही बता दे॥ 4896॥
11इन्द्र या और कोई गोविंद राधे।
12कर्म फल भोग नहिं मेटे बता दे॥ 4897॥
13इन्द्र भी कर्मों का गोविंद राधे।
14दास है मायाधीन बता दे॥ 4898॥
15इन्द्र भी एक दिन गोविंद राधे।
16काल के गाल में जाये बता दे॥ 4899॥
17सृष्टि की उत्पत्ति गोविंद राधे।
18होती है रजोगुण ते बता दे॥ 4900॥
19सृष्टि की स्थिति भी गोविंद राधे।
20होती है सत्व गुण ते बता दे॥ 4901॥
21सृष्टि का अन्त भी गोविंद राधे।
22होता है तमोगुण ते बता दे॥ 4902॥
23रजोगुण प्रेरणा ते गोविंद राधे।
24मेघ भी जल बरसायें बता दे॥ 4903॥