Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 407
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1भक्त और मैं एक गोविंद राधे।
2भक्त को मेरा दूजा रूप बता दे॥ 4724॥
3भक्त बिनु मैं नहिं गोविंद राधे।
4मेरे बिनु भक्त नहिं मर्म बता दे॥ 4725॥
5भक्त उर मैं रहुँ गोविंद राधे।
6मेरा उर भक्त रहें भेद ना बता दे॥ 4726॥
7पूर्व स्वतंत्र हरि गोविंद राधे।
8साधक है परतंत्र बता दे॥ 4727॥
9पश्चात परतंत्र गोविंद राधे।
10हरि, हो स्वतंत्र हरिभक्त बता दे॥ 4728॥
11पूर्व हो सेव्य हरि गोविंद राधे।
12साधक तो सेवक ही बता दे॥ 4729॥
13पश्चात सेव्य भक्त गोविंद राधे।
14हरि हों भक्त के भक्त बता दे॥ 4730॥
15हरि तो हैं सेव्य किन्तु गोविंद राधे।
16हरि प्रेम हरि को भी दास बना दे॥ 4731॥
17परम स्वतंत्र हरि गोविंद राधे।
18ऐसा वेदशास्त्र अरु रसिक बता दे॥ 4732॥
19परम स्वतंत्र कृष्ण गोविंद राधे।
20भक्त भक्ति के परतंत्र बता दे॥ 4733॥
21थे तो अजित कृष्ण गोविंद राधे।
22भक्त भक्ति ने जीता अजित बता दे॥ 4734॥
23हरि हैं शासक गोविंद राधे।
24किन्तु भक्ति उनको भी शास्य बना दे॥ 4735॥